मानवता की हत्या

सड़क के उस छोर पर कैसा जुलूस है भेड़ियों की भीड़ है दांत नुकीले सभी नाखूनों से चीरता अट्टहास करता है कभी अभी-अभी वह मानव था बची थी उसमे मानवता पर जातीय श्रेष्ठता ने खून कर डाला अभी अब लेस मात्र भी वह मानव नहीं जानवर में भी गाय तो बिल्कुल नहीं अभी-अभी उसने अपने भीतर के मानव की हत्या कर डाली। - आनंद प्रवीण ( यह कविता सड़कों पर दिन-दहाड़े होने वाले अत्याचार को प्रदर्शित करती है। बेवजह या छोटी सी बात पर गरीबों और खासकर दलितों को भारी नुकसान सहना पड़ता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर मैंने इस कविता की रचना की है।)

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