परंपरागत डिग्री और आधुनिक युग

आज परंपरागत डिग्री का कोई महत्व ही नहीं रह गया है। बी ए, एम ए किये हुए विद्यार्थी ऐसे मिलते हैं जैसे वह पढ़ा-लिखा हो ही नहीं। क्या परंपरागत डिग्री देने वाले कॉलेजों में शिक्षकों को वेतन नहीं मिलता है? क्या समाज में उन शिक्षकों का मान नहीं है? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपने कॉलेज के बच्चों की शिक्षा का ख़्याल रखे? फिर ऐसा क्यों है? दाखिला मिल जाने के बाद विद्यार्थी भी अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं। वह पढ़ाई छोड़ अन्य गतिविधियों में अधिक भाग लेने लग जाते हैं। अन्य गतिविधियों में भाग लेना गलत नहीं है, पर पढ़ाई उसका मूल आधार है। पढ़ाई के मूल्य पर जब वह अन्य गतिविधियों में भाग लेता है तब ये पूरी तरह गलत है। कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों को भी चाहिए कि वह पाठ्यक्रम को इस तरह व्यवस्थित करें और शिक्षा को आधुनिकता से जोड़ कर इस तरह सुदृढ़ता प्रदान करें ताकि शिक्षित युवा बेरोज़गार न रहे। बहुत दुखद स्थिति होती है जब कोई उच्च शिक्षा प्राप्त युवा रोज़गार के लिए यह नहीं देखता कि पद कौन सा है, वेतन कितना है बस हर एक खाली पद पर उसकी नज़र होती है कि काश वो पद मुझे मिल जाए। ऐसी स्थिति में सिर्फ वर्ग के पीछे के छात्र नहीं हैं बल्कि वर्ग में अव्वल आने वाले भी इसी कतार में शामिल हैं। राज्य के तमाम स्कूल- कॉलेजों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो सके। भाषा की कक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे छात्र अपने ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने के कारण ग्लानि न महसूस करे। उसमें स्वस्थ प्रतियोगी भावना का विकास हो इसका भी खास ध्यान रखना होगा। तब जाकर हमारी शिक्षा रोज़गार दे पाएगी। अन्यथा हम शिक्षित बेरोजगारों की ही भीड़ बने रहेंगे।

आनंद प्रवीण, कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना।

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