लोकतंत्र की मजबूती के लिए समाज का शिक्षित होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि हमारे ज़िंदा रहने के लिए वायु का। हम शिक्षित समाज के बिना लोकतंत्र की कल्पना कर ही नहीं सकते। गाँव में मुखिया के चुनाव से लेकर देश की सरकार चुनने तक हमारे समाज की परीक्षा इसी माध्यम से हो जाती है। शिक्षा के इस महत्व को ध्यान में रखते हुए हमारे यहाँ प्रौढ़ शिक्षा की भी व्यवस्था की गई ; फिर भी हम जरूरी मापदंडों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा क्यों है इसकी पड़ताल की जरूरत है। आज भी वोट करने का प्रमुख आधार जाति है। क्या इससे लोकतंत्र की मजबूती बढ़ती है? बिल्कुल नहीं बल्कि इससे कमज़ोर ही होता है। प्रत्याशी का चरित्र कैसा है, उसका विचार क्या है, वह समाज में कैसा बदलाव ला सकता है, उसमें नेतृत्व क्षमता है भी या नहीं इसकी चर्चा कोई नहीं करता। चर्चा इस बात कि होती है कि वह किस जाति का है, उसका धर्म क्या है और उस जाति या धर्म के वोटर कितने हैं। उसकी जाति या धर्म से ही बहुत हद तक उसका चुनावी परिणाम निर्धारित हो जाता है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि आज के युवा रूढ़िवादी परंपरा से आगे बढ़ कर सोच पाते हैं। जाति- धर्म उनके लिए भी एक आधार है किन्तु वे इससे पूर्णतया जकड़े हुए नहीं है ं। अपनी भाषा और संस्कृति से उन्हें भी प्रेम है किन्तु दूसरी भाषा और संस्कृति से कोई गुरेज़ भी नहीं है। यह बदलाव शिक्षा के माध्यम से ही आ रहा है। अतः हमें शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में पहल करनी चाहिए और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने में अपना योगदान देना चाहिए। जिससे बेहतर कल का निर्माण हो पाएगा और हम सुसंस्कृत समाज के परिपक्व नागरिक कहलाएंगे।
आनंद प्रवीण, कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना।
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