युवा सोच की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है कि ऐसी सोच जिसमें रुढ़िवादी परंपरा से आगे जाने का साहस हो, सामाजिक बंधनों के इतर भी कुछ सोच या कर पाने की शक्ति हो और कुछ कर गुज़रने का जुनून हो। ऐसी सोच किसी सीमा में बंधना नहीं चाहती, यह मुक्त विचार रखती है। ऐसे लोगों को 'कल क्या होगा' का भय नहीं रहता। बेख़ौफ़ अपनी राय रखने की सोच ही युवा सोच है। ऐसी सोच अगर साठ वर्ष की उम्र में भी है तो आप युवा हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि युवा सोच रखने के लिए आप उम्र से भी युवा हों ये जरूरी नहीं है।
इसी युवा सोच पर अगर उचित लगाम न लगाया जाए तो यह स्वच्छंदता का रूप ले लेती है जोकि हर दृष्टिकोण से ख़तरनाक है। भवातिरेक भी स्वच्छंदता का ही एक पहलू है। हमें इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
हर क्षेत्र से युवा अपनी प्रतिभा के दम पर एक मुकाम हासिल करना चाहता है। जाति, धर्म या अन्य कोई भी बाँटने वाला तत्व उसे रोक पाने में नाकामयाब है। यही आधुनिक परिवेश की वास्तविक कामयाबी है। शिक्षा, कला, खेल, शासन- प्रशासन हर क्षेत्र में सामाजिक बेड़ियाँ टूट रही हैं और इसी अनुपात में हर क्षेत्र में स्त्री-शक्ति भी बढ़ रही है। क्या यह बदलते भारत की तस्वीर नहीं है?
आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक हर तरह का बदलाव समाज में देखने को मिल रहा है। शहर से लेकर गाँव तक समाज की तस्वीर बदली है। लोगों की सोच में परिपक्वता आई है। समाज में यह बदलाव जिस किसी कारण से आया हो पर यह सकारात्मक बदलाव है; इसका असर दूरगामी होगा। सचमुच हमारा देश युवाओं का देश है और हम सभी युवा हैं।
"भले ही कोई हजारों वर्षों तक ग़ुलाम रहा हो
आज़ादी का एक झोंका काफ़ी है
ग़ुलामी से मुक्ति पाने के लिए। "
आनंद प्रवीण, छात्र, कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना।
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