अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी जी ने पहली बार देश को हिंदी में संबोधित किया था। वह हिंदी पट्टी के नहीं थे । उनकी मातृभाषा गुजराती थी और उनकी शिक्षा अंग्रेजी में हुई थी । ऐसे में उन्हें हिंदी सीखने की क्या जरूरत थी ? हमें यह समझना होगा कि हिंदी ही देश भाषा बन सकती है यह स्वतः स्फूर्त भाषा है । भले ही देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं पर साथ ही वे यह भी जानते हैं कि अगर पूरे देश को अपनी बात सुनानी है तो हिंदी का सहारा लेना पड़ेगा। हिंदी बेशक देश-भाषा है और इस बात का प्रमाण यह है कि कोई विदेशी नागरिक अगर भारत आना चाहता है और यहां की भाषा जानना चाहता है तो उसके पास एकमात्र पसंद हिंदी होती है। देश में इतनी लोकप्रियता होने के बावजूद भी अगर हिंदी को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा तो इसका एकमात्र कारण है -- हमारी खुद को दूसरों की अपेक्षा कम आंकने की मानसिकता। हमारे यहां एक कहावत है "घर की मुर्गी दाल बराबर" हम इस कहावत का इस्तेमाल सिर्फ बोलने और लिखने के लिए कर पा रहे हैं । समझ नहीं रहे हैं। जिस दिन यह कहावत समझ में आ जाएगी हमारी भाषा, संस्कृति हमारा देश यहां की मिट्टी उन्नति करने लग जाएंगे और फिर कभी शिकायत नहीं रहेगी कि हम अपनी ही भाषा को सम्मान नहीं दे रहे हैं।
Comments
Post a Comment