ओपन माइक और साहित्य

ओपन माइक साहित्य की गंभीरता को कम कर रहा है। बेहतर होता कि मंच तक ले जाने से पहले नए रचनाकारों को साहित्य की गरिमा और उसका स्तर बनाए रखने की शिक्षा दी जाती। हर कोई प्रेमचंद और दिनकर नहीं हो सकता पर उस दिशा में तो चल ही सकते हैं। मेरा मतलब अनुकरण करने से बिल्कुल भी नहीं है किन्तु हमारी रचनात्मकता को सही दिशा हमारे पूर्व के साहित्यकारों और उनकी रचनाओं को समझने से ही मिल पाएगी। हमें इस बात को समझ लेना चाहिए कि मंच मिल जाना हमारे साहित्यकार हो जाने का प्रमाण नहीं है। यह ठीक है कि किसी भी चीज़ को सर्वसुलभ कर देने से उसके स्तर में गिरावट आती है किन्तु स्तर को बनाए रखने के लिए किसी परिपक्व मार्गदर्शक का होना जरूरी है। नहीं तो तालियों के आधार पर रचनाकार खुश होते रहेंगे जोकि साहित्य के लिए, पाठकों के लिए और स्वयं रचनाकार के लिए घातक साबित हो सकता है। युवा रचनाकारों से मेरा आग्रह है कि अगर आप सही मायने में अपनी रचना कौशल से अपने भाषा-साहित्य को मज़बूती देना चाहते हैं तो आपको संवेदनशील होना पड़ेगा ; न सिर्फ कुछ लोगों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति के लिए और अन्य सभी प्राणियों के लिए भी। आनंद प्रवीण, संदलपुर, पटना।

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