भूखा है क़ौम मेरा

भूखा है क़ौम मेरा नंगा है क़ौम मेरा इक रोटी पाने के लिए जलता है क़ौम मेरा। धूप में जलते-जलते पड़ गये हैं छाले तन पे है नहीं आशियां हमारा न हैं हम किसी वतन के। इतिहास नहीं हमारा कोई न ही ग्रंथ कोई लिखा गया कहते हैं मूलवासी हम हैं फिर पहचान हमारी कौन मिटा दिया? हमारे ही क़ौम से निकले लोग हम ही को नीच पाते हैं हम दबे- कूचले हैं जिनसे वे उन्हीं के पैर सहलाते हैं। बिकता है क़ौम मेरा सस्ता है क़ौम मेरा है दर्द को भूला कबका भोला है क़ौम मेरा। नाम बदलते हैं हमारे पहचान बदलते हैं हमारे पर नहीं बदलती तस्वीर हमारी नहीं बदलते भाग्य हमारे। रोज़ कमाते हैं हम फिर भी भूखे रह जाते हैं वस्त्र भी ठीक कहाँ रहता बिन चादर के सो जाते हैं। जलता है क़ौम मेरा और हाथ सेंकते तुम हो कहते हो हम मज़बूत हैं और हमें हाँकते तुम हो। "धरती मेरी माता, पिता आसमान" मज़ाक हो ये तुम्हारे लिए भले पर ये हमारी हक़ीक़त है। हमारी हक़ीक़त का क्यों असर होगा तुम पर? तुम अपनी महलों में खुश हो। हम जलते नहीं तुम्हारी खुशी से हम तो सोच भी नहीं सकते वहाँ तक पर अगर जब यह देश हमारा है तो हमारे हिस्से की जमीन भी है, रोटी भी है हमें वही चाहिए। ओ! स्वयं में जीने वाले हमारे नेता अस्तित्व तुम्हारा हम से है। हमने तुम्हें बनाया कि बन सको हमारी आवाज़ मत होने दो दफ़्न सपने करो फिर से नया आग़ाज़। आनंद प्रवीण (मृत्युंजय), पटना।

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