मेरे अरमान को दफ़नाना आसान नहीं


धुँआ है हर तरफ़, कहीं आग का निशान नहींं
मेरे ही अपने शहर में मेरी पहचान नहीं। 

कौन है अपना, पराया है कौन पहचान गया
ऐसी हालात से टकराना आसान नहीं। 

छुपा के रखा हूँ, दिल में अरमान कई
मेरे अरमान को दफ़नाना आसान नहीं। 

कल तलक ख़्वाब था पर अब हक़ीक़त हूँ मैं
मेरे गिरेबान तक पहुँच पाना आसान नहीं। 

मेरी उम्मीद की जमीं अब गुलज़ार हुई
किसी पतझड़ का अब आना आसान नहीं। 

Comments

Post a Comment